नैन मिलाकर मोहन सौ,वृषभानु लली मन में मुस्कान।
भौंह मरोर के दूसरी और,कछु वह घूंघट में शरमाई।
देखि निहाल भई सजनी,व सूरतिया मम माँहि समानी।
औरन की परवाह नही,अपनी ठकुराइन राधिका रानी॥
नवनीत गुलाब तैं कोमल हैं,हठी कुंज की मंजुलताइन में।
गुललाला गुलाल प्रबाल जपा छबि ऐसी न देखी ललाइन में॥
मुनि मानस मन्दिर मध्य बसैं बस होत हैं सूधे सुभाइन में।
बहु रे मन,तू चित चाइन सौं,वृषभानु कुमारि के पाइन में॥
नैन मिलाकर मोहन सौ,वृषभानु लली मन में मुस्कान।
भौंह मरोर के दूसरी और,कछु वह घूंघट में शरमाई।
देखि निहाल भई सजनी,व सूरतिया मम माँहि समानी।
औरन की परवाह नही,अपनी ठकुराइन राधिका रानी॥
नवनीत गुलाब तैं कोमल हैं,हठी कुंज की मंजुलताइन में।
गुललाला गुलाल प्रबाल जपा छबि ऐसी न देखी ललाइन में॥
मुनि मानस मन्दिर मध्य बसैं बस होत हैं सूधे सुभाइन में।
बहु रे मन,तू चित चाइन सौं,वृषभानु कुमारि के पाइन में॥

No comments yet
Comments feed for this article