नैन मिलाकर मोहन सौ,वृषभानु लली मन में मुस्कान।
भौंह मरोर के दूसरी और,कछु वह घूंघट में शरमाई।
देखि निहाल भई सजनी,व सूरतिया मम माँहि समानी।
औरन की परवाह नही,अपनी ठकुराइन राधिका रानी॥
नवनीत गुलाब तैं कोमल हैं,हठी कुंज की मंजुलताइन में।
गुललाला गुलाल प्रबाल जपा छबि ऐसी न देखी ललाइन में॥
मुनि मानस मन्दिर मध्य बसैं बस होत हैं सूधे सुभाइन में।
बहु रे मन,तू चित चाइन सौं,वृषभानु कुमारि के पाइन में॥

नैन मिलाकर मोहन सौ,वृषभानु लली मन में मुस्कान।

भौंह मरोर के दूसरी और,कछु वह घूंघट में शरमाई।

देखि निहाल भई सजनी,व सूरतिया मम माँहि समानी।

औरन की परवाह नही,अपनी ठकुराइन राधिका रानी॥

नवनीत गुलाब तैं कोमल हैं,हठी कुंज की मंजुलताइन में।

गुललाला गुलाल प्रबाल जपा छबि ऐसी न देखी ललाइन में॥

मुनि मानस मन्दिर मध्य बसैं बस होत हैं सूधे सुभाइन में।

बहु रे मन,तू चित चाइन सौं,वृषभानु कुमारि के पाइन में॥

मेरी छैल छबीली राधे,मेरे छैल छबीले श्याम।
मेरी रसिक रंगीली राधे,मेरे रसिक रंगीले श्याम।
मेरी गुन गर्वीली राधे,मेरे गुन गर्वीले श्याम।
मेरी भोरी भारी राधे,मेरे चंचल श्याम।
मेरी प्यारी सदा किशोरी,मेरो प्रियतम सदा किशोर।
मेरी प्यारी पिय चितचोरी,मेरो पिय प्यारी चितचोर।
मेरी प्यारी रतिरस बोरी,मेरो पिय रसिकन सिरमोर।
मेरी प्यारी भोरी भारी,मेरो पिय नटखट बरजोर।

मेरी छैल छबीली राधे,मेरे छैल छबीले श्याम।

मेरी रसिक रंगीली राधे,मेरे रसिक रंगीले श्याम।

मेरी गुन गर्वीली राधे,मेरे गुन गर्वीले श्याम।

मेरी भोरी भारी राधे,मेरे चंचल श्याम।

मेरी प्यारी सदा किशोरी,मेरो प्रियतम सदा किशोर।

मेरी प्यारी पिय चितचोरी,मेरो पिय प्यारी चितचोर।

मेरी प्यारी रतिरस बोरी,मेरो पिय रसिकन सिरमोर।

मेरी प्यारी भोरी भारी,मेरो पिय नटखट बरजोर।

परिकम्मा को या विधि दीजै ।
रुक रुक ध्यान करो गिरिवर को,वार वार सिर दीजै ।
सुमरत नाम मगन मन चलिये,परमारथ भी कीजै ।
वाद विवाद त्याग मारग में,मौन प्रार्थना कीजै ।
बटै प्रसाद जो भर भर दोना,बस प्रणाम करि दीजै ।
भूख प्यास के कष्ट होय जो,बडे प्रेम सह लीजै ।
साधु संत की सेवा करके,जनम सफल कर लीजै ।

परिकम्मा को या विधि दीजै ।

रुक रुक ध्यान करो गिरिवर को,वार वार सिर दीजै ।

सुमरत नाम मगन मन चलिये,परमारथ भी कीजै ।

वाद विवाद त्याग मारग में,मौन प्रार्थना कीजै ।

बटै प्रसाद जो भर भर दोना,बस प्रणाम करि दीजै ।

भूख प्यास के कष्ट होय जो,बडे प्रेम सह लीजै ।

साधु संत की सेवा करके,जनम सफल कर लीजै ।

तुम मेरे थे मेरे हो मेरे ही रहोगे, बहकूँ न अब बहकाने से।
जब समझ प्रेम में डूब गई, तब क्या होगा समझाने से॥
दे दी ऐसी विरह वेदना, मिटि जाये मम अहं चेतना।
और अधिक चमकेगा सोना, पुनि पुनि अग्नि तपाने से॥
चाहे मम आलिंगन कर लो, चाहे मम प्रानन ही हर लो।
चाहे जी भर कर तडपा लो, मोहि काम श्याम गुण गाने से॥
तुम हार मान लो बनवारी, बदनाम न हो जाये दासी।
हारोगे हारे हो सब दिन, पछतावोगे इतराने से॥
तू ही तो सब कुछ मेरा है, यह कहा हुआ भी तेरा है।
जग में भी बढता प्यार सदा, पिय के घर आने जाने से॥
लख चौरासी स्वाँग बनाये, नट ज्यों बहुविधि खेल दिखाये।
अब तो अपने पास बुला लो, रीझोगे न रिझाने से।
चुप का मतलब अब समझ लिया, अखिर पिय ने अपना ही लिया।
आशा तो पहले से ही थी, बिनु हेतु कृपालु कहाने से॥

तुम मेरे थे मेरे हो मेरे ही रहोगे, बहकूँ न अब बहकाने से।

जब समझ प्रेम में डूब गई, तब क्या होगा समझाने से॥

दे दी ऐसी विरह वेदना, मिटि जाये मम अहं चेतना।

और अधिक चमकेगा सोना, पुनि पुनि अग्नि तपाने से॥

चाहे मम आलिंगन कर लो, चाहे मम प्रानन ही हर लो।

चाहे जी भर कर तडपा लो, मोहि काम श्याम गुण गाने से॥

तुम हार मान लो बनवारी, बदनाम न हो जाये दासी।

हारोगे हारे हो सब दिन, पछतावोगे इतराने से॥

तू ही तो सब कुछ मेरा है, यह कहा हुआ भी तेरा है।

जग में भी बढता प्यार सदा, पिय के घर आने जाने से॥

लख चौरासी स्वाँग बनाये, नट ज्यों बहुविधि खेल दिखाये।

अब तो अपने पास बुला लो, रीझोगे न रिझाने से।

चुप का मतलब अब समझ लिया, अखिर पिय ने अपना ही लिया।

आशा तो पहले से ही थी, बिनु हेतु कृपालु कहाने से॥

आंगन नन्द के दधिकादो।
छिरकत गोपी ग्वाल परस्पर प्रगटे जग में जादो॥१॥

दूध लियो दधि लियो लियो घृत माखन माट संयूत।
घरघरते सब गावत आवत भयो महर के पूत॥२॥

वाजत तूर करत कोलाहल वारि वारि दे दान।
जियो जसोदा पूत तिहारो यह घर सदा कल्यान॥३॥

छिरके लोग रंगीले दीसे हरदी पति सुवास।
’मेहा’ आनंद पुंज सुमंगल यह ब्रज सदा हुलास॥४॥

सब ग्वाल नाचे गोपी गावे। प्रेम मगन कछु कहत न आवे॥१॥
हमारे राय घर ढोटा जायो। सुनि सब लोग बधाये आयो॥२॥
दूध दही घृत कावरि ढोरी। तंदुल दूब अलंकृत रोरी॥३॥
हरद दूध दधि छिरकत अंगा। लसत पीत पट वसन सुरंगा॥४॥
ताल पखावज दुंदुभी ढोला। हसत परस्पर करत कलोला॥५॥
अजिर पंक गुलफन चढि आये। रपटत फिरत पग न ठहराये॥६॥
वारिवारि पट भूषन दीने। लटकत फिरत महा रस भीने॥७॥
सुधि न परे को काकी नारी। हसिहसि देत परस्पर तारी॥८॥
सुर विमान सब कौतुक भूले। मुदित ’त्रिलोक’ विमोहित फूले॥९॥

नन्द बधाई दीजे हो ग्वालन।
तुमारे स्याम मनोहर आये गोकुल के प्रतिपालन॥१॥

युवतिन बहु विधि भूषन दीजे विप्रन को गौदान।
गोकुल मंगल महा महोत्सव कमल नैन घनस्याम॥२॥

नाचत देव विमल गंधर्व मुनि गावे गीत रसाल।
परमानन्द प्रभु तुम चिरजीयो नंदगोप के लाल॥३॥

जसोदे बधाइयाँ बधाइयाँ जसोदे बधाइयाँ।
नंदरानी दे लाल ऊपना सेस सनेह जिवाइयाँ॥१॥

सजल चंदा रवि कीता फूली अंग न माइयाँ।
आज सबे सुखदानियाँ व्रज भीना सभी भलाइयाँ॥२॥

आनन्द भरियाँ सोहनियाँ सब गोपियाँ तो घर आइयाँ।
पुत्र जायो जग जीवना तेडे लागि बडाइयाँ॥३॥

तेडे भागि सुख होंदा सभी गोल घुमाइयाँ।
अमृतसार जौ लाधा ऐसी पुरियाँ केतिक मगाइयाँ॥४॥

अखियाँ ठंडियाँ सोहनियाँ ऐसी साधा सबे पुजाइयाँ।
सुखी होए सुरनर मुनि मानो रंक निधि पाइयाँ ॥५॥

दूध दही सिर पाँवडे नाचे दे ग्वाला खेल मचाइयाँ।
बडभागी नंदजू दानदें मोहो मांगी ठकुराइयाँ॥६॥

’रामराय’ प्रभु प्रगटिया ’भगवान लला’ मन भाइयाँ।
जसोदे बधाइयाँ बधाइयाँ जसोदे बधाइयाँ।

ऐसो पूत देवकी जायो।
चारों भुजा चार आयुध धरि, कंस निकंदन आयो ॥१॥

भरि भादों अधरात अष्टमी, देवकी कंत जगायो।
देख्यो मुख वसुदेव कुंवर को, फूल्यो अंग न समायो॥२॥

अब ले जाहु बेगि याहि गोकुलबहोत भाँति समझायो।
हृदय लगाय चूमि मुख हरि को पलना में पोढायो॥३॥

तब वसुदेव लियो कर पलना अपने सीस चढायो।
तारे खुले पहरुवा सोये जाग्यो कोऊ न जगायो॥४॥

आगे सिंह सेस ता पाछे नीर नासिका आयों।
हूँक देत बलि मारग दीनो, नन्द भवन में आयो॥५॥

नन्द यसोदा सुनो बिनती सुत जिनि करो परायो।
जसुमति कह्यो जाउ घर अपने कन्या ले घर आयो॥६॥

प्रात भयो भगिनी के मंदिर प्रोहित कंस पठायो।
कन्या भई कूखि देवकी के सखियन सब्द सुनायो॥७॥

कन्या नाम सुनो जब राजा, पापी मन पछतायो।
करो उपाय कंस मन कोप्यो राज बहोत सिरायो॥८॥

कन्या मगाय लई राजा ने धोबी पटकन आयो।
भुजा उखारि ले गई उर ते राजा मन बिलखायो॥९॥

वेदहु कह्यो स्मृति हू भाख्यो सो डर मन में आयो।
’सूर’ के प्रभु गोकुल प्रगटे भयो भक्तन मन भायो॥१०॥

यच्च दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले।
गोपिकानां तु यद्‌दुःखं स्यान्मम क्वचित्‌॥१॥

गोकुले गोपिकानां च सर्वेषां व्रजवासिनाम्‌।
यत्सुखं समभूत्तन्मे भगवान्‌ किं विधास्यति॥२॥

उद्धवगमने जात उत्सवः सुमहान्‌ यथा।
वृन्दावने गोकुले वा  तथा मे मनसि क्वचित्‌॥३॥

महतां कृपयां यावद्‌ भगवान्‌ दययिष्यति।
तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय हि॥४॥

महतं कृपया यद्वत्‌ कीर्त्तनं सुखदं सदा।
न तथा लौकिकानां तु स्निग्धभिजनरुक्षवत॥५॥

गुणगाने सुखावाप्तिर्गोव्न्दस्य प्रजायते।
यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोsन्यतः॥६॥

क्लिश्यमानाच्जनान्‌ दृष्ट्‌वा कृपायुक्तो यदा भवेत्‌।
तदा सर्वं सदानन्दं हृदिस्थं निर्गतं बहिः॥७॥

सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः।
हृद्‌गतः स्वगुणान्‌ श्रुत्वा पूर्णः प्लावयते जनान्‌॥८॥

त्स्मात्सर्वं परियज्य निरुद्धैः सर्वदा गुणाः।
सदानन्दपरैर्गेयाः सच्चिदानन्दता ततः॥९॥

अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः।
निरुद्धानं तु रोधायः निरोधं वर्णयामिते॥१०॥

हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मग्ना भवसागरे।
ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहरिनिशम्‌॥११॥

संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय वै।
कृष्णस्य सर्ववस्तूनि भूम्न ईशस्य योजयेत्‌॥१२॥

गुणेष्वाविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः।
संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम्‌॥१३॥

तदा भवेद्‌दयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता।
बाधशंकापि नास्त्यत्र तदध्यासोsपि सिद्धयति॥१४॥

भगवद्धर्म सामर्थ्यादिरागो विषये स्थिरः।
गुणैहरेः सुखस्पर्शान्न दुःखं भाति कर्हिचित्‌॥१५॥

एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्कर्षं गुणवर्णने।
अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः॥१६॥

हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि।
दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टं तथा कृतिगति सदा॥१७॥

श्रवणं कीर्त्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णाप्रिये रतिः।
पायोर्मलांशत्यागेन शेषभागं तनौ नयेत्‌॥१८॥

यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते।
तदा विनिग्रहस्तस्य कर्त्तव्य इति निश्चयः॥१९॥

नातः परतरो मन्त्रो नातः परतरः स्तवः।
नातः परतरा विद्या तीर्थं नातः परात्परम्‌॥२०॥

पश्चात्तपनिवृत्यर्थं परित्यागो विचार्यते।
स मार्गाद्वितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः॥१॥

कर्म मार्गे न कर्त्तव्यः सुतरां कलिकालतः।
अत आदौ भक्तिमार्गे कर्त्तव्यत्वाद्विचारणा॥२॥

श्रवणादिप्रसिद्धयर्थं कर्त्तव्यश्चेत्स नेष्यते।
सहाय संग साध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात्‌॥३॥

अभिमानान्नियोगाच्च तद्‌धर्मैश्च विरोधतः।
गृहादेर्बाधकत्वेन साधनार्थं तथा यदि॥४॥

अग्रेsपि तादृशैरेव संगो भवति नान्यथा।
स्वयंच विषयाक्रान्तः पाषण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥

विषयाक्रांत देहानां नावेशः सर्वथा हरेः।
अतोsत्र साधने भक्तौ नैव त्यागः सुखावहः॥६॥

विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते।
स्वीयबन्धनिवृत्यर्थं वेषः सोsत्र न चान्यथा॥७॥

कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत्‌।
भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते॥८॥

विकलत्वं तथाsस्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं नहि।
ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्त्तमानस्य बाधकाः॥९॥

सत्यलोके स्थितिर्ज्ञानात्संन्यासेन विशेषितात्‌।
भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत्‌॥१०॥

तादृशाः सत्यलोकदौ  तिष्ठन्त्येव न संशयः।
बहिश्चेत्प्रकटः स्वात्मा वहिवत्प्रविशेद्यदि॥११॥

तदैव सकलोबन्धो नाशमेति न चान्यथा।
गुणास्तुसंगराहित्याज्जीवनार्थं भविन्ति हि॥१२॥

भगवान्‌ फलरूपत्वान्नात्र बाधक इष्यते।
स्वास्थ्यवाक्यं न कर्त्तव्यं दयालुर्न विरुद्धयेत॥१३॥

दुर्लभोsयं परित्यागः प्रेरणा सिद्धयति नान्यथा।
ज्ञानमार्गे तु सन्यासो द्विविधोsपि विचारितः॥१४॥

ज्ञानार्थमुत्तराग्ङञ्च सिद्धिर्जन्मशतैः परम्‌।
ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम्‌॥१५॥

अतः कलौ स सन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा।
पाषण्डित्वं भवेच्चापि तस्माज्जाने न सन्यसेत्‌॥१६॥

सुतरां कलिदोषाणां प्रबलत्वादिति स्थितम्‌।
भक्तिमार्गेपिचेद्दोषस्तदा किं कार्यमुच्यते॥१७॥

अत्रारम्भे न नाशः स्याद्‌ दृष्टान्तस्याप्यभावतः।
स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाद्‌ बाधः केनास्य संभवेत्‌॥१८॥

हरिरत्र न शक्नोति कर्तु बाधां कुतोsपरे।
अन्यथा मातरो बालान्‌ न स्तन्यैः पुपुषुः क्वचित्‌॥१९॥

“ज्ञानिनामपि” वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति।
आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थं मोहयोष्यति॥२०॥

तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम्‌।
अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति में निश्चता मतिः॥२१॥

इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चतम्‌।
सन्यासावरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत्‌॥२२॥

॥इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितः सन्यासनिर्णयः समाप्तः॥

श्रीकृष्णरसविक्षिप्तमानसा रतिवर्जिताः।
अनिर्वृतालोकवेदे ते मुख्याः श्रवणोत्सुकाः॥१॥

विक्लिन्नमनसो ये तु भगवत्स्मृतिविहृवलाः।
अर्थेकनिष्ठास्ते चापि मध्यमाः श्रवणोत्सुकाः॥२॥

निःसंदिग्धं कृष्णतत्वं सर्वभावेन ये विदुः।
तत्वावेशात्तु विकला निरोधाद्वा न चान्यथा॥३॥

पूर्णभावेन पूर्णाथाः कदाचित्त तु सर्वदा।
अन्यासक्तास्तु ये केचिदधमाः परिकीर्तिताः॥४॥

अनन्यमनसो मर्त्या उत्तमाः श्रवणादिषु।
देशकालद्रव्यकर्तृ मन्त्रकर्म प्रकारतः॥५॥

॥इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितनि पच्चपद्यानि॥

यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते।
बीजभावे दृढ़े तु स्यात्यागाच्छवण कीर्त्तनात्‌॥१॥

बीजदाढ्‌र्य प्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः।
अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः॥२॥

व्यावृतोsपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा।
ततः प्रेम तथाssसक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत्‌॥३॥

बीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढ़ं यन्नपि नश्यति।
स्नेहाद्रागविनाशः स्यादासत्तया स्याद्‌गृहारुचिः॥४॥

गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वं च भासते।
यदा स्याद्वयसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि॥५॥

ताद्यशस्यापि सततं गृहस्थानं विनाशकम्‌।
त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थैकमनसः॥६॥

लभेत सुदृढ़ां भक्तिं सर्वतोप्यधिकां पराम्‌।
त्यागे बाधकभूयस्त्वं दुःसंसएगात्तथान्नतः॥७॥

अतस्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परेः।
अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति ॥८॥

सेवायां वा कथायां वा यस्याssसक्तिर्दृढ़ा भवेत।
यावज्जीवं तस्य नाशो न क्वापीति मे मतिः॥९॥

बाधसंभावनायं तु नैकान्ते वास इष्यते।
हरिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशयः॥१०॥

इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्वं निरूपितम्‌।
य एतत्‌समधीयेत तस्यापि स्याद्‌ दृढ़ा रतिः॥११॥

॥इति श्रीवल्लभाचार्यविरचित भक्तिवर्द्धिनी सम्पूर्णा॥

अंतःकरण मद्वाक्यं सावधानतया शृणु।
कृष्णात्परं नास्ति दैवं वस्तुतो दोषवर्जितं॥१॥

चाण्डाली चेद्राजपत्नि जाता राज्ञा च मानिता।
कदाचिदपमानेsपि मूलतः का क्षतिर्भवेत॥२॥

समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः।
का ममाधमता भाव्या पश्चातापो यतो भवेत॥३॥

सत्यसंकल्पतो विष्णुर्नान्यथा तु करिष्यति।
आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोsन्यथा भवेत॥४॥

सेवकस्य तु धर्मोsयं स्वामी स्वस्य करिष्यति।
आज्ञा पूर्व तु या जाता गंगासागर संगमे॥५॥

याsपि पश्चानमधुवने न कृतं तद्द्द्वयं मया।
देहदेश परित्यागस्तृतीयो लोक गोचरः॥६॥

पश्चातापः कथं तत्र सेवकोहं न चान्यथा।
लौकिकप्रभुवत्कृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन॥७॥

सर्व समर्पितं भक्त्या कृतार्थोsसि सुखीभव।
प्रौढापि दुहिता यद्वत्‌ स्नेहान्न प्रेष्यते वरे॥८॥

तथा देहेन कर्त्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा।
लोकवच्चेत्स्थिर्मे स्यात्‌ किंस्यादितिविचाराय॥९॥

अशक्ये हरिरेवास्ति मोहं मागाः कथञ्चन।
इतिश्री कृष्णदास्य वल्लभस्य हितं वचः॥१०॥
चित्तं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिंततां व्रजेत॥

॥ इतिश्रीमद्‌वल्लभाचार्यकृतोअंतःकरणप्रबोधः सम्पूर्णः ॥

विवेकधैर्ये सततं रक्षरणीय तथाश्रयः
विवेकस्तु “हरिः” सर्व निजेच्छातः करिष्यति॥१॥

प्रार्थिते वा ततः किं स्यात्‌ स्वाम्यभिप्रायसंशयात्‌।
सर्वत्र तस्य सर्वं हि सर्वसामर्थ्यमेव च॥२॥

अभिमानस्य संत्याज्यः स्वाम्यधीनत्व भावनात्‌।
विशेतश्वे दाज्ञा स्यादन्तः करणगोचरा॥३॥

तदा विशेषगत्यादि भाव्यं भिन्नं तु दैहिकात्‌।
आपद्‌गत्यादिकार्येषु हठस्त्याज्यश्च सर्वथा॥४॥

अनाग्रहश्च सर्वत्र धर्माधर्माग्रदर्शनम्‌।
विवेकोsयं समाख्यातोधैर्यं तु विनिरूप्यते॥५॥

त्रिदुःखसहनं धैर्यमामृतेः सर्वतः सदा।
तक्रवद्भेहवभाव्यं जडवद्‌गोपभार्यवत्‌॥६॥

प्रतीकारो यद्‌च्छातः सिद्धश्चेन्नाग्रही भवेत्‌।
भार्यादीनां तथान्येषामसतश्चाक्रमं सहेत्‌॥७॥

स्वयमिन्द्रियकार्याणि कायवाङ्‌मनसा त्यजेत्‌।
अशूरेणपि कर्त्तव्यं स्वस्यासामर्थ्यभावनात्‌॥८॥

अशक्ये हरिरेवास्ति सर्वमाश्रयतोभवेत्‌।
एतत्सहनमत्रोक्त्तमाश्रयोsतो निरूपयेत॥९॥

एहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः।
दुःखहानौ तथा पापे भये कामद्यपूरणे॥१०॥

भक्तदोहे भक्तयभावे भक्तैश्‍चापि क्रमे कृते।
अशक्ये वा सुशवये वा सर्वथा शरणं हरिः॥११॥

अहंकार कृते चैव पोष्य पोषणरक्षणे।
पोष्यातिक्रमणे चैव तथान्तेवास्यतिक्रमे॥१२॥

अलौकिक मनः सिद्धौ सर्वार्थं शरणं हरिः।
एवं चित्ते सदा भाव्यं वाचा च परिकीर्तयेत्‌॥१३॥

अन्यस्य भजनं तत्र स्वतो गमन मेव च।
प्रार्थनाकार्य मात्रेsपि ततोsन्यत्र विवर्जयेत्‌॥१४॥

अविश्वासो न कर्त्तव्यः सर्वथा वाधकस्तु सः।
ब्रह्मास्त्र चातकौ भाव्यौ प्राप्तं सेवेत निर्ममः॥१५॥

यथाकथंचित्‌ कार्याणि कुर्यादुच्चावचान्यपि।
किंवा प्रोक्तेन बहुना शरणं भावयेद्भरिम्‌॥१६॥

एवमाश्रयणं प्रोक्तं सर्वेषां सर्वदा हितम्‌।
कलौ भक्तयादिमार्गा हि दुस्साध्या इति मे मतिः॥१७॥

॥ इति श्री वल्लभाचर्यप्रोक्तं विवैकधैर्याश्रयं सम्पूर्णम्‌ ॥

पुष्टिप्रवाह मर्यादा विशेषेण पृथक पृथक।
जीव-देह-क्रियाभेदैः प्रवाहेण फलेन च॥१॥

वक्ष्यामि सर्वसन्देहा न भविष्यन्ति यच्छुतेः।
भक्तिमार्गस्यकथनात पुष्तिरस्तीति निश्चयः॥२॥

“द्वौ भूतसर्गा” वित्युक्तेः प्रवाहोSपि व्यवस्थितः।
वेदस्य विद्यमानत्वान्मर्यादापि व्यवथिता ॥३॥

कश्चितदेव हि भक्तो हि “यो मद्भक्त” इतीरणात।
सर्वत्रोत्कर्षकथनात पुष्टिरस्तीति निश्चयः॥४॥

न सर्वोतः प्रवाहादि भिन्नोवेदाच्च भेदतः।
“यदा यस्ये” ति वचना “न्नाहंवेदै” रितीरणात॥५॥

मार्गैकत्वेपि चेदन्त्यौ तनू भक्तयागमौ मतौ।
न तद्युक्तं सूत्रतोहि भिन्नौ युक्तया हि वैदिकः॥६॥

जीवदेहकृतीनां च भिन्नत्वं नित्यता श्रुतेः।
यथा तद्वत्पुष्टिमार्गे द्वयोरपि निषेधतः॥७॥

प्रमाण्भेदाद्भिन्नोहि पुष्टिमार्गो निरूपितः।
सर्गभेदं प्रवक्ष्यामि स्वरूपांगक्रियायुतम॥८॥

इच्छामात्रेण मनसा प्रवाहं सृष्टवान हरिः।
वचसा वेदमार्ग हि पुष्टिः कायेन निश्चयः॥९॥

मूलेच्छातः फलं लिके वेदोक्तं वैदिकेपि च।
कामेन तु फलं पुष्टौ निजेच्छातोsपि नैकता॥१०॥

“तानहं द्विषतो” वाक्याद्भिन्ना जीवाः प्रवाहिणः।
अत एवेतरौ भिन्नौ सान्तौ मोक्षप्रवेशतः॥११॥

तस्माज्जीवाः पुष्टिमार्गे भिन्ना एव न संशयः।
भगवदरूप सेवार्थं तत्सृष्टिर्नान्यथा भवेत॥१२॥

स्वरूपेणावतारेण लिंगेन च गुणेन च।
तारतम्यं न स्वरूपे देहे वा तत्क्रियासु वा॥१३॥

तथापि यावता कार्य तावत्त्स्य करोति हि।
ते हि द्विधा शुद्धमिश्रभेदान्मिश्रास्त्रिधा पुन॥१४॥

प्रवाहादिविभेदेन भगवतकार्यसिद्धये।
पुष्ट्याविमिश्राः सर्वज्ञाः प्रवाहेण क्रियारताः॥१५॥

मर्यादया गुणज्ञास्ते शुद्धाः प्रेम्णातिदुर्लभाः।
एवं सर्गस्तु तेषां हि फलं त्वत्र निरूप्यते॥१६॥

भगवानेव हि फलं स यथाssविर्भवेद्भुवि।
गुणस्वरूपभेदेन तथा तेषां फलं भवेत॥१७॥

आसक्तौ भगवानेव शापं दापयति क्वचित।
अहंकारेsथवा लोके तन्मार्गस्थापनाय हि॥१८॥

न ते पाषण्डतांयान्ति न च रोगाद्युपद्रवाः।
महानुभावाः प्रायेण शास्त्रं शुद्धत्वहेतवे॥१९॥

भगवत्तारतम्येन तारतम्यं भजन्ति हि।
वैदिकत्वं लौकिकत्वं कापट्यात्तेषु नान्यथा॥२०॥

वैष्णवत्वं हि सहजं ततोsन्यत्र विपर्ययः।
सम्बन्धिनस्तु ये जीवाः प्रवाहस्थास्तथाsपरे॥२१॥

चर्षणीशब्दवाच्यास्ते ते सर्वे सर्ववतर्मसु।
क्षणात्सर्वत्वमायान्ति रुचिस्तेषां न कुत्रचित॥२२॥

तेषां क्रियानुसारेण सर्वत्र शकलं फलं।
प्रवाहस्थान प्रवक्ष्यामि स्वरूपांगक्रियायुतान॥२३॥

जीवास्ते ह्मासुराः सर्वे “प्रवृत्तिं चेति” वर्णिताः।
ते च द्विधा प्रकीतर्यन्ते ह्मज्ञदुर्ज्ञविभेदतः॥२४॥

दुर्ज्ञास्ते भगवत्प्रोक्ता ह्मज्ञास्ताननु ये पुनः।
प्रवाहेपि समागत्य पुष्टिस्थस्तैर्न युज्यते॥
सोsपिस्तैस्तत्कुले जातः कर्मणा जायते यतः॥२५॥

॥इति श्रीमद वल्लभाचार्य विरचितः पुष्टिप्रवाहमर्यादाभेदः सम्पूर्ण॥

नत्वा हरिं प्रवक्ष्यामि स्वसिद्धांत विनिश्चयम।
कृष्ण सेवा सदा कार्या मानसी सा परा स्मृता॥१॥

चेतस्तस्प्रवणं सेवा तत्सिच्द्धयै तनुवित्तजा।
ततः संसारदुःखस्य निवृत्तिर्ब्रह्मबोधनम॥२॥

परं ब्रह्म तु कृष्णो हि सच्चिदानंदकं बृहत।
द्विरूपं तद्वि सर्वं स्यादेकं तस्माद्विलक्षणम॥३॥

अपरं तत्र पूर्वस्मिन वादिनो बहुधा जगुः।
मायिकं सगुणं कार्यं स्वतंत्र चेति नैकधा॥४॥

तदेवैतत्प्रकारेण भवतीति श्रुतेर्मतम।
द्विरूपं चापि गंगावज्ज्ञेयं सा जलरूपिणी॥५॥

माहात्म्यसंयुता नृणां सेवतांभुक्तिमुक्तिदा।
मर्यादामार्गविधिना तथाब्रह्मापि बुद्ध्यताम॥६॥

तत्रैव देवतामूर्तिर्भक्तया या हश्यते क्वचित।
गंगायांच विशेषेण प्रवाहाभेदबुद्धये॥७॥

प्रत्यक्षा सा न सर्वेषां प्राकाम्यं स्यात्तया जले।
विहिताच्च फलात्तद्धि प्रतीत्यापि विशिष्यते॥८॥

यथा जलं तथा सर्वं यथा शक्ता तथा बृहत।
यथा देवी तथा कृष्ण्स्तत्राप्येतदिहोच्यते॥९॥

जगत्तु त्रिविधं प्रोक्तं ब्रह्मविष्णुशिवास्ततः।
देवतारूपवत्प्रोक्ता ब्रह्मणीत्थं हरिर्मतः॥१०॥

कामचारस्तु लोकेस्मिब्रह्मदिभ्यो न चान्यथा ।
परमानन्दरूपे तु कृष्णे स्वात्मनि निश्चयः॥११॥

अतस्तु ब्रह्मवादेन कृष्णे बुद्धिर्विधीयताम।
आत्मनि ब्रह्मरूपे हि छिद्रा व्योम्नीव चेतनाः॥१२॥

उपाधिनाशे विज्ञाने ब्रह्मत्वत्वावबोधने।
गंगातीरस्थितो यद्वदेवतां तत्र पश्यति॥१३॥

तथा कृष्णं परं ब्रह्म स्वस्मिन ज्ञानी प्रपश्यति।
संसारी यस्तु भजते स दूरस्थो यथा तथा॥१४॥

अपेक्षित जलादीनामभावात्तत्र दुःखभाक।
तस्माच्छ्रीकृष्णमार्गस्थो विमुक्तः सर्वलोकतः॥१५॥

आत्मानंदसमुद्रस्थं कॄष्णमेव विचिन्तयेत।
लोकार्थी चेदभजेत कृष्णं क्लिष्टो भवति सर्वथा॥१६॥

क्लिष्टोपि चेदभजेत कॄष्णं लोको नश्यति सर्वथा।
ज्ञानाभावे पुष्टिमार्गी तिष्ठेत पूजोत्सवादिषु॥१७॥

मर्यादस्थस्तु गंगायां श्रीभगवततत्परः।
अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः॥१८॥

उभयोस्तु क्रमेणैव पूर्वोक्तैव फलिष्यति।
ज्ञानाधिको भक्तिमार्ग एवं तस्मान्निरूपितः॥१९॥

भक्तयभावे तु तीरस्थो यथा दुष्टैः स्वकर्मभिः।
अन्यथाभावनापन्नस्तस्मात्स्थानाच्च नश्यति॥२०॥

एवं स्वशास्त्रसर्वस्वं मया गुप्तं निरूपितम।
एतदवुध्वा विमुच्येत पुरुषः सर्वसंशयात॥२१॥

॥इति श्री वल्लभाचार्य विरचिता सिद्धांतमुक्तावली सम्पूर्ण॥

श्री लछमन कुल चंद उदित जग उद्योतकारी।
मात इलम्मा विमलराका उडुगन निजजन समाज पोषत पीयूष वचन हरियस उजियारी॥१॥

करुनामय निष्कलंक मायावाद तिमिर हरन सकल कला पूरन मन द्विजवपुधारी।
बलि बलि बलि माधोदास चरन कमल किये निवास भयो चकोर लोचन छबि निरखत गिरिधारी॥२॥

आनंद आज भयो हो भयो जगती पर जय जय कार।
श्री लछमन गृह प्रगट भये हैं श्री वल्लभ सुकुमार॥१॥

धन्य धन्य माधव मास एकादसी कृष्णपक्ष रविवार।
गुननिधान श्री गिरिधर प्रगटे लीला द्विज तनु धार॥२॥

प्रभु श्रीलछमन गृह प्रगट भये।
हरि लीला रस सिंधु कला निधि बचन किरन सब ताप गये॥१॥

मायावाद तिमिर जीवन को प्रगटत नास भयो उर अंतर ।
फूले भक्त कुमोदिनी चहुँ दिस सोभित भये भक्ति मन सारस॥२॥

मुदित भये कमल मुख तिनके वृथा वाद आये गनत बल।
गिरिधर अन्य भजन तारागन मंद भये भजि गावत चंचल॥३॥

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