जसोदा हरि पालने झुलावै ।
हलरावे दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै ॥१॥

मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै न आनि सुवावै ।
तू काहे नहि बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै ॥२॥

कबहुँ पलक हरि मूँद लेत है, कबहुँ अधर फरकावै ।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि करि सेन बतावै ॥३॥

इहि अन्तर अकुलाइ उठे हरि,जसुमति मधुरै गावै ।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ,सो नंद भामिनि पावै ॥४॥