नैन भरि देखि अब भानु तनया ।
केलि पिय सों करें भ्रमर तबहि परें, श्रम जल भरत आनंद मनया ॥१॥

चलत टेढी होय लेत पिय को मोहि, इन बिना रहत नहिं एक छिनया ।
रसिक प्रीतम रास करत श्री यमुना पास, मानो निर्धनन की है जु धनया ॥२॥