नाम महिमा ऐसी जु जानो ।
मर्यादादिक कहें लौकिक सुख लहे पुष्टि कों पुष्टिपथ निश्चे मानो ॥१॥

स्वाति जलबुन्द जब परत हें जाहि में , ताहि में होत तेसो जु बानो ।
श्री यमुने कृपा सिंधु जानि स्वाति जल बहु मानि, सूर गुण पुर कहां लो बखानों ॥२॥