फूलन की मंडली मनोहर बैठे मदन मोहन पिय राजत ।
प्रसरित कुसुम सुवासित चहुँदिश लुब्ध मधुप गुंजारत गाजत ॥१॥

पहरे विविध भांत आभूषण पीतांबर वैजयंती छाजत ।
देखि मुखारविंद की शोभा रतिपति आतुर भयो अति भ्राजत ॥२॥

एकरूप बहुरूप परस्पर वरणों कहा देख मन लाजत ।
रसिकचरण सरोज आसरो करिवे कोटि यत्न जिय साजत ॥३॥