चकइरी चल चरण सरोवर जहां नहि प्रेम वियोग ।
जहां भ्रम निशा होत नहिं कबहुं सो सायर सुखयोग ॥१॥

सनकसे हंस मीन शिव मुनिजन नख रवि प्रभा प्रकाश ।
प्रफुलित कमल निमिश नहिं शशीडर गुंजत निगम सुवास ।२॥

जिंहिंसर सुभग मुक्ति मुक्ताफल विमल सुकृत जल पीजे ।
सो सर छांड क्यों कुबुद्धि विहंगम इहां रही कहा कीजे ॥३॥

जहां श्री सहस्त्र सहित हरि क्रीडत शोभित सूरजदास ।
अब न सुहाय विषय रस छिल्लर वह समुद्र की आस ॥४॥