हों याचक श्री वल्लभ तिहारो याचन तुमकि आयो हो ।
महा उदार देत भक्तन को अपअपनों मन भायो हो ॥१॥

हेम ग्राम भूषण सुख संपति सो मोहि मन न सुहायो हो ।
पर्यो रहूं नित्य जूठन पाऊं यह मेरे चित लायो हो ॥२॥

प्रफुल्लित भयो निरंतर द्विजवर ब्रह्मवाद तरु छायो हो ।
गाऊं गुण लावण्य सिंधु के दास चरण रज पायो हो ॥३॥