परम कृपाल श्री वल्लभ नंदन करत कृपा निज हाथ दे माथे ।
जे जन शरण आय अनुसरही गहे सोंपत श्री गोवर्धननाथ ॥१॥

परम उदार चतुर चिंतामणि राखत भवधारा बह्यो जाते ।
भजि कृष्णदास काज सब सरही जो जाने श्री विट्ठलनाथे ॥२॥