आज कहूं ते या गोकुल में अदभुत वरखा आई हो।
मणिगण हेम हीर धारा की, ब्रजपति अति झर लाई हो॥१॥

वानी वेद पढत द्विज दादुर हिये हरखि हरियाये।
दधि घृत नीर क्षीर नाना रंग बहि चले खार पनारे॥२॥

पटह निसान भेरि सहनाई महा गरज की घोरें।
मागध सूत वदत चातक पिक बोलत बंदी मोरे॥३॥

भूषण वसन अमोल नंद जु नर नारिन पहराये।
शाखा फल दल फूलन मानों उपवन झालर लाये॥४॥

आनंद भरि नाचत व्रजनारी पहरे रंग रंग की सारी।
वरन वरन बादरन लपेटी विद्युत न्यारी न्यारी॥५॥

दरिद्र दावानल बुझे सबन के जाचक सरोवर पूरे।
बाढी सुभग सुजस की सरिता दुरित तीर तरु चूरे॥६॥

उल्हयो ललित तमाल बाल एक भई सबन मन फूल।
छाया हित अनुलाय गदाधर तक्यो चरन को मूल॥७॥