भली करी पूजा तुम मेरी।
बहुत भांत कर व्यंजन अरप्यो, सो सब मान लई मैं तेरी॥१॥

सहस्त्र भुजाधर भोजन कीनो, तुम देखत विद्यमान।
मोहि जानत यह कुंवर कन्हैया, नाहिन कोऊ आन॥२॥

पूजा सबकी मान लई में जाउ घरन व्रज लोग।
सूर श्याम अपने कर लीने बांटत जूठो भोग॥३॥