अद्भुत सोभा वृंदावन की देखो नंदकुमार।
कंत वसंत जानि आवत बन बेली कियो सिंगार॥१॥

पल्लव बरन बरन पहिरे तन बरन बरन फूले फूल।
ये तो अधिक सुहायो लागत मनि अभरन समतूल॥२॥

नंदनंदन विहंग अनंग भरी भाजत मनहुँ बधाई।
मंगल गीत गायवे को मानो कोकिल वधू बुलाई॥३॥

बहत मलय मारुत परचारग सबके मन संतोसे।
द्विज भोजन सोहत आलिंगन अधु मकरन्द परोसे॥४॥

सुनि सखी वचन गदाधर प्रभु के चलो सखी तहाँ जैये।
नवल निकुंज महल मंडप में हिलि-मिलि पंचम गैये॥५॥