विहरतिहरिरिह सरस वसंते।
नृत्यति युवति जनेन समंसखि विरहिजनस्य दुरंते॥

ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे।
मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजति कुंज कुटीरे॥१॥

उन्मद मदन मनोरथ पथिक वधू जन जनित विलापे।
अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल बकुल कलापे॥२॥

मृगमद सौरभरभवशं वदनवदलमाल तमाले।
युवजन हृदय विदारण मनसिजन खरुचिकिंशुकजाले॥३।

मदन महीपति कनक दंड रुचि केसर कुसुम विकासे।
मिलितशिलीमुख पाट्लपटल कृत स्मरतूणविलासे॥४॥

विगलित लज्जित जगदवलोकन तरुण करुण कृत हासे।
विरहि निकृंतनकुंतमुखाकृति केतकिदंतुरिताशे॥५॥

माधविकापरिमलललिते नवमालतिजाति सुगंधौ।
मुनि-मनसामपि मोहन कारिणि तरुणाकारणबंधौ॥६॥

स्फुटदतिमुक्तलतापरिरंभणमुकुलितपुलकितचूते।
वृन्दावनविपिने परिसरपरिगतयमुनाजलपूते॥७॥

श्री जयदेव भणितमिदमुदयति हरिचरण्स्मृतिसारं।
सरस वसंत समय वन वर्णन मनुगत मदन विकारं॥८॥