प्रगट भये प्रभु श्रीमद वल्लभ ब्रज वल्लभ द्विज देह।
निजजन सब आनंदित गावत बजत बधाई सबहिन के गेह॥१॥

भूतल प्रगट्यो भाव श्रुतिन को उपज्यो नंदनंदन पद नेह।
मिटे ताप निजजन के मन के बरखे प्रेम भक्ति रस मेह॥२॥

निरखत श्री मुखचंद सबन के दूर भये सब निगम संदेह।
मिटि गये सब कपट कुटिल खल मारग भस्म भये सब आसुर जेह॥३॥

करत केलि कुंजन नित गिरिधर सुधि करिवो जो पूरव नेह।
कहत दास जोरी चिरजीयो क्यों गुन बरनें नाहिन छेह॥४॥