कांकरवारे तैलंग तिलक द्विज वंदो श्रीमद लछमननंद ।
द्वैपथ राज सिरोमनि सुंदर भूतल प्रगटे वल्लभ चंद॥१॥

अबजु गहे विष्णुस्वामी पथ नवधा भक्ति रतन रस कंद ।
दरसन ही प्रसन्न होत मन प्रगटे पूरन परमानंद॥२॥

कीरत विसद कहां लों बरनों गावत लीला श्रुति सुर छंद।
सगुनदास प्रभु षट्गुन संपन्न कलिजन उद्धरन आनंद कंद॥३॥