सुखद माधव मास कृष्ण एकादशी भट्ट लछमन गेह प्रगट बैठे आइ।
ब्रज जुवती गूढ मन इंद्रियाधीस आनंद गृह जानि विधु निगमगति घट पाइ॥१॥

अज्ञ जन ग्रहन सुत भवन तैसो जानि बिमल मति पाइ विधु जात हेरी आइ।
दनुज मायिक मत नम्र कंधर किये लिये ध्वज जानि ध्वज सुक्र है सुखदाई॥२॥

अवनितल मलिनता दूर करिवे काज गेह सुख दैन जामित्र गति सन जाइ।
धर्म पथ भूप गुरु चरन वल्लभ जानि देव गुरु भौम अनुचर भए री आइ॥३॥

प्रखर मायावाद सत्रु संघात कारन सूररिपु सदन को छाइ।
गिरिधरन कर्म अर्पन विधुतुंद दसम गेह गहि रहत अनुकूल कृतिकों पाइ॥४॥