सब ग्वाल नाचे गोपी गावे। प्रेम मगन कछु कहत न आवे॥१॥
हमारे राय घर ढोटा जायो। सुनि सब लोग बधाये आयो॥२॥
दूध दही घृत कावरि ढोरी। तंदुल दूब अलंकृत रोरी॥३॥
हरद दूध दधि छिरकत अंगा। लसत पीत पट वसन सुरंगा॥४॥
ताल पखावज दुंदुभी ढोला। हसत परस्पर करत कलोला॥५॥
अजिर पंक गुलफन चढि आये। रपटत फिरत पग न ठहराये॥६॥
वारिवारि पट भूषन दीने। लटकत फिरत महा रस भीने॥७॥
सुधि न परे को काकी नारी। हसिहसि देत परस्पर तारी॥८॥
सुर विमान सब कौतुक भूले। मुदित ’त्रिलोक’ विमोहित फूले॥९॥