राग विभास
जगावन आवेंगी ब्रजनारी अति रस रंग भरी।
अति ही रूप उजागरि नागरि सहज सिंगार करी॥१॥

अति ही मधुर स्वर गावति मोहनलाल को चित्त हरें।
मुरारीदास प्रभु तुरत उठि बैठे लीनी लाय गरें॥२॥