जानि पाये हो ललना ।
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥

अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥