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जब तें वल्लभ भूतल प्रगट भये।
वदन सुधानिधि निरखत प्रभु कौ सब दूर गये॥१॥

श्री लछमन वंस उजागर सागर भक्ति वेद सब फिर जुटये।
मायावाद सब खंड खंडन करि अति आनंद भये॥२॥

गिरिधर लीला विस्तारन कारन दिन दिन केलि रये।
सगुनदास सिर हस्तकमल धरि श्री चरनांबुज गहे॥३॥

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वल्लभ भूतल प्रगट भये।
माधव मास कृष्ण एकादशी पूरन विधु उदये॥१॥

पुत्र जन्म सुन श्री लछमन भट बहु विधि दान दिये।
मागध सूत बंदीजन बोलत सब दुःख दूर गये॥२॥

पुष्टि प्रकास करन को आये द्विज स्वरूप धरये।
विष्णुदास के सिर बिराजत प्रभु आनंदमये॥३॥

आज जगती पर जयजय जार।

प्रगट भये श्री वल्लभ पुरुषोत्तम बदन अग्नि अवतार॥१॥

धन्य दिन माधव मास एकादसी कृष्ण पच्छ रविवार।

श्री मुख वाक्य कलेवर सुन्दर धर्यो जगमोहन मार॥२॥

श्री भगवत आत्म-अंग जिनके प्रगट करन विस्तार।

दुंदुभी देव बजावत गावत सुर-वधू मंगल चार॥३॥

पुष्टि प्रकास करेंगे भू पर जनहित जग अवतार।

आनंद उमग्यो लोक तिहूंपुर जन ’गिरिधर’ बलिहार॥२॥

नौमी चैत की उजियारी।
दसरथ के गृह जनम लियौ है मुदित अयोध्या नारी॥१॥

राम लच्छमन भरत सत्रुहन भूतल प्रगटे चारी।
ललित विलास कमल दल लोचन मोचन दुःख सुख कारी॥२॥

मन्मथ मथन अमित छबि जलरुह नील बसन तन सारी।
पीत बसन दामिनी द्युति बिलसत दसन लसत सित भारी॥३॥

कठुला कंठ रत्न मनि बघना धनु भृकुटी गति न्यारी।
घुटुरुन चलत हरत मन सबको ‘तुलसीदास’ बलिहारी॥४॥

रंचक चाखन देरी दह्यो।
अद्भुत स्वाद श्रवन सुनि मोपे नाहित परत रह्यो॥१॥

ज्यों ज्यों कर अंबुज उर ढांकत त्यों त्यों मरम लह्यो।
नंदकुमार छबीलो ढोटा अचरा धाय गह्यो॥२॥

हरि हठ करत दास परमानंद यह मैं बहुत सह्यो।
इन बातन खायो चाहत हो सेंत न जात बह्यो॥३॥

मोहन केसे हो तुम दानी।
सूधे रहो गहो अपनी पति तुमारे जिय की जानी॥१॥

हम गूजरि गमारि नारि हे तुम हो सारंगपानी।
मटुकी लई उतारि सीसते सुंदर अधिक लजानी ॥२॥

कर गहि चीर कहा खेंचत हो बोलत चतुर सयानि।
सूरदास प्रभु माखन के मिस प्रेम प्रीति चित ठानी॥३॥

मोहन मांगत गोरस दान।
कनक लकुट कर लसत सुभग अति कही न जात यह बान॥२॥

अति कमनीय कनक तन सुंदरी हसि परसत पिय पान।
श्री विट्ठल गिरिधरलाल वर मांगत मृदु मुसिकान॥२॥

हमारो दान देहो गुजरेटी।
बहुत दिनन चोरी दधि बेच्यो आज अचानक भेटी॥१॥

अति सतरात कहा धों करेगी बडे गोप की बेटी।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनध्र भुज ओढनी लपेटी॥२॥

श्री लक्ष्मण घर बाजत आज बधाई ।
पूरण ब्रह्म प्रकटे पुरुषोत्तम श्री वल्लभ सुखदाई ॥१॥
नाचत वृद्ध तरुण और बालक, उर आनंद न समाई ।
जयजय यश बंदीजन बोलत विप्रन वेद पढाई ॥२॥
हरद दूब अक्षत दधि कुंकुम आंगन कीच मचाई ।
वंदन माला मालिन बांधत मोतिन चोक पुराई ॥३॥
फूले द्विजवर दान देत हें पट भूषण पहराई।
मिट गये द्वंद नंददासन के मन वांछित फल पाई ॥४॥

डोल माई झूलत हैं ब्रजनाथ ।
संग शिभित वृषभान नंदिनी ललिता विशाखा साथ ॥१॥

वाजत ताल मृदंग झांझ डफ रुंज मुरज बहु भांत ।
अति अनुराग भरे मिल गावत अति आनंद किलकात ॥२॥

चोवा चण्दन बूकावंदन उडत गुलाल अबीर ।
परमनानंद दास बलिहारी राजत हे बलवीर ॥३॥

मनमोहन अद्भुत डोल बनी ।
तुम झूलो हों हरख झुलाऊं वृंदावन चंदधनी ॥१॥

परम विचित्र रच्यो विश्वकर्मा हीरा लाल मणी ।
चतुर्भुज प्रभु गिरिधरन लाल छबि कापें जात गनी ॥२॥

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