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मंगल आरती कीजे भोर ॥
मंगल जन्म कर्म गुण मंगल मंगल यशोदा माखन चोर ॥१॥

मंगल वेणु मुकुट गुण मंगल मंगल रूप रमे मनमोर ॥
जन भगवान जगत में मंगल मंगल राधायुगलकिशोर ॥२॥

जानि पाये हो ललना ।
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥

अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति।
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥

अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥

कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥

साँझ के साँचे बोल तिहारे।
रजनी अनत जागे नंदनंदन आये निपट सवारे॥१॥

अति आतुर जु नीलपट ओढे पीरे बसन बिसारे।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर  भले वचन प्रतिपारे॥२॥

सुभग सेज सोभित कौसल्या रुचिर राम सिसु गोद लिये।
बाललीला गावत हुलरावत पुलकित प्रेम पीयुष पिये॥१॥

कबहू पौढि पय पान करावत कबहूं राखत लाय हिये।
बार बार बिधु बदन बिलोकत लोचन चारु चकोर पिये॥२॥

सिव विरंच मुनि सब सिहात हैं चितवत अंबुज ओट दिये।
तुलसीदास यह सुख रघुपति को पायो तो काहू न बिये॥३॥

कौसल्या रघुनाथ कों लिये गोद खिलावे।
सुंदर बदन निहारकें हँसि कंठ लगावे॥१॥

पीत झगुलिया तन लसे पग नूपुर बाजे।
चलन सिखावे राम कों कोटिक छबि लाजे॥२॥

सीस सुभग कुलही बनी माथे बिंदु बिराजे।
नील कंठ नख केहरी कर कंकन बाजे॥३॥

बाल लीला रघुनाथ की यह सुने और गावे।
तुलसीदास कों यह कृपा नित्य दरसन पावे॥४॥

लीला लाल गोवर्धनधर की।
गावत सुनत अधिक रुचि उपजत रसिक कुंवर श्री राधावर की॥१॥

सात द्योस गिरिवर कर धार्यो मेटी तृषा पुरंदरदर की।
वृजजन मुदित प्रताप चरण तें खेलत हँसत निशंक निडर की॥२॥

गावत शुक शारद मुनि नारद रटत उमापति बल बल कर की।
कृष्णदास द्वारे दुलरावत मांगत जूठन नंदजू के घर की॥३॥

तुम नंदमहर के लाल मोहन जाने दे।
रानी जसुमति प्रान आधार मोहन जाने दे॥ ध्रु.॥
श्री गोवर्धन के शिखर तें, मोहन दीनी टेर।
अंतरंग सों कहतें सब ग्वालिन राखों घेर॥ नागरी दान दे ॥१॥
ग्वालिन रोकी ना रहे ग्वाल रहे पचिहार।
अहो गिरधारी दोरिया सो कह्यो न मानत ग्वार ॥॥ नागरी दान दे ॥२॥
चली जात गोरस मदमाती मानो सुनत नही कान।
दोरि आये मन भामते सों रोकी अंचल तान॥॥ नागरी दान दे ॥३॥
एक भुजा कंकन गहे, एक भुजा गहि चीर।
दान लेन ठाडे भये, गहवर कुंज कुटीर॥॥ नागरी दान दे ॥४॥
बहुत दिना तुम बची गई हो दान हमारो मार।
आजहों लेहों आपनो दिन दिन को दान संभार ॥ नागरी दान दे ॥५॥
र्स निधान नव नागरी निरख वचन मृदु बोल।
क्यों मुरी ठाडी होत हे, घूंघट पट मुख खोल॥ नागरी दान दे ॥६॥
हरख हिये करि करखिकें मुख तें नील निचोल।
पूरन प्रगट्यो देखिये मानो चंद घटा की ओल ॥ नागरी दान दे ॥७॥
ललित वचन सुमुदित भये नेति नेति यह बेन।
उर आनंद अतिहि बढ्यो सो सुफल भये मिलि नेने॥ नागरी दान दे ॥८॥
यह मारग हम नित गई कबहू सुन्यो नही कान।
आज नई यह होत हे सो मांगत गोरस दान॥ मोहन जाने दे ॥९॥
तुम नवीन नवनागरि नूतन भूषण अंग।
नयो दान हम मांगनो सो नयो बन्यो यह रंग॥ नागरी दान दे ॥१०॥
चंचल नयन निहारिये अति चंचल मृदु बेन।
कर नही चंचल कीजिये तजि अंचल चंचल नेन॥मोहन जाने दे ॥११।
सुंदरता सब अंग की बसनन राखी गोय।
निरख निरख छबि लाडिली मेरो मन आकर्षित होय॥ नागरी दान दे ॥१२॥
ले लकुटी ठाडे रहे जानि सांकरि खोर।
मुसकि ठगोरि लायके सकत लई रति जोर॥ मोहन जाने दे ॥१३॥
नेंक दूरि ठाडे रहोकछू ओर सकुचाय।
कहा कियो मन भावते मेरे अंचल पीक लगाय॥ नागरी दान दे ॥१४॥
कहा भयो अंचल लगी पीक हमारी जाय।
याके बदले ग्वालिनी मेरे नयनन पीक लगाय॥ मोहन जाने दे ॥१५॥
सुधे बचनन मांगिये लालन गोरस दान।
मोहन भेद जनाई के सो कहेत आन की आन॥ नागरी दान दे ॥१६॥
जैसे हम कछु कहत हे एसी तुम कहि लेहु।
मन माने सो कीजिये पर दान हमारो देहु॥ मोहन जाने दे ॥१७॥
कहा भरे हम जात हे दान जो मांगत लाल।
भई अवार घर जाने दे सो छांडो अटपटी चाल॥ नागरी दान दे ॥१८॥
भरे जातहो श्री फल कंचन कमल वसन सों ढांक।
दान जो लागत ताहि को तुम देकर जाहु नोंसाक॥ मोहन जाने दे ॥१९॥
इतनी विनती मानिये मांगत ओलि ओड।
गोरस को रस चाखिये लालन अंचल छोड॥ नागरी दान दे ॥२०॥
संग की सखी सब फिर गई सुनि हें कीरति माय।
प्रीति हिय में राखिये सो प्रगट किये रस जाय॥ मोहन जाने दे ॥२१॥
काल्ह बहोरि हम आय हें गोरस ले सब ग्वारि।
नीकि भांति चखाई हें मेरे जीवन हों बलिहारी॥ नागरी दान दे ॥२२॥
सुनि राधे नवनागरी हम न करे विश्वास।
करको अमृत छांडि के को करे काल्हिकी आस॥ मोहन जाने दे ॥२३॥
तेरो गोरस चाखवे मेरो मन ललचाय।
पूरन शशिकर पाय के चकोर धीर न धराय॥ नागरी दान दे ॥२४॥
मोहन कंचन कलसिका किली सीस उतार।
श्रमकन वदन निहारिके सो ग्वालिन अति सुकुमार॥ मोहन जाने दे ॥२५॥
नव विंजन गहि लालजु श्री कर देत ढुराय।
श्रमित भई चलो कुंज में नंक पलोटु पाय॥ नागरी दान दे ॥२६॥
जानत हो यह कोन हे एसी ढीठ्यो देत।
श्री वृषभानकुमारि हे अरि तोहि बीच को लेत॥ मोहन जाने दे॥२७॥
गोरे श्री नंदराय जु गोरि जसुमति माय।
तुम यांहिते सामरे एसे लच्छित पाय ॥मोहन जाने दे॥२८॥
मन मेरो तारन बसे ओर अंजन की रेख।
चोखी प्रीत हिये बसे यातो सांवल भेख॥॥ नागरी दान दे ॥२९॥
आप चाल सों चालिये यहे बडेन की रीति।
एसी कबहुं न कीजिए हँसे लोग विपरीति॥ नागरी दान दे ॥३०॥
ठाले ठुले फिरत हो और कछु नही काम।
बाट घाट रोकत फिरो आन न मानत श्याम ॥मोहन जाने दे॥३१॥
यही हमारो राज है ब्रजमंदल सब ठौर।
तुम हमारी कुमुदिनी कम कमल बदन के भोंर। ॥ नागरी दान दे ॥३२॥
एसे में कोउ आई हे देंखे अद्भुत रीति।
आज सबे नंदलाल जु प्रगट होयगी प्रीति॥मोहन जाने दे॥३३॥
व्रज वृंदावन गिरी नदी पशु पंछी सब संग।
इनसो कहा दुराइये प्यारे राधा मेरो अंग॥॥ नागरी दान दे ॥३४॥
अंस भुजा धरि ले चले प्यारी चरन निहोर।
निरखत लीना रसिकजु जहां दान के ठोर॥मोहन जाने दे॥३५॥

सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुन चलत रेणु तनु मंडित, मुख पर दधि को लेप किए॥१॥

चारु कपोल लोल लोचन छवि, गोरोचन को तिलक दिए।
लट लटकनि मनो मत्त मधुपगन, मादक मद हि पिए॥२॥

कठुला कंठ वज्र के हरि नख, राजत हैं अरु रुचिर हिए।
धन्य सूर एको पल यह सुख, कहा भयो सत कल्प जिए॥३॥

झुंडन गावत हे ब्रजनारी ।
नवसत साजसिंगार कनक तन पहेरें झूमक सारी ॥१॥

कंचन थार लियेजु कमलकर मंगल साज संवारी ।
दधि अक्षत अरु श्री फल कुमकुम ओर दूब कुसुम मालारी ॥२॥

नाचत गावत करत कुलाहल उमगि देत कर तारी ।
श्री लक्ष्मण गृह खेल मच्यो हे भीर भयी अति भारी ॥३॥

घर घर बांधी बंदनमाला मंगल कलश ध्वजारी ।
श्री वल्लभ मुख कमल निरख छबि दास रसिक बलिहारी ॥४॥

चरण पंकज रेणु श्री यमुने जु देनी ।
कलयुग जीव उद्धारण कारण, काटत पाप अब धार पेनी ॥१॥

प्राणपति प्राणसुत आये भक्तन हित, सकल सुख की तुम हो जु श्रेनी ।
गोविन्द प्रभु बिना रहत नहिं एक छिनु, अतिहि आतुर चंचल जु नैनी ॥२॥

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे ।
ताके अधीन ह्वै रहत हे प्राणपति नैन अरु बेन में रस जु छावे ॥१॥

वेद पुराण की बात यह अगम हे, प्रेम को भेद कोऊ न पावे ।
कहत गोविन्द श्री यमुने की जापर कृपा, सोइ श्री वल्लभ कुल शरण आवे

श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता ।
जो इनकी शरण जात है दौरि के, ताहि को तीहिं छिनु कर सनाथा ॥१॥

एहि गुन गान रसखान रसना एक सहस्त्र रसना क्यों न दइ विधाता ।
गोविन्द प्रभु तन मन धन वारने, सबहि को जीवन इनही के जु हाथा ॥२॥

श्याम संग श्याम, बह रही श्री यमुने ।
सुरत श्रम बिंदु तें, सिंधु सी बहि चली, मानो आतुर अलि रही न भवने ॥१॥

कोटि कामहि वारों, रूप नैनन निहारो, लाल गिरिधरन संग करत रमने ।
हरखि गोविन्द प्रभु, निरखि इनकी ओर मानों नव दुलहनीं आइ गवने ॥२॥

महामहोत्सव श्री गोकुल गाम ।
प्रेम मुदित युवती जस गावत श्याम सुन्दर को ले ले नाम ॥
जहाँ तहाँ लीला अवगाहत खरिक खोर दधि मंथन ठाम ।
करत कुलाहल निस और वासर आंनंद में बीतत सब याम ॥
नंद गोप सुत सब सुख दायक मोहन मूरति पूरन काम ।
‘चतुर्भुज’ प्रभु गिरधर आनंद मेरे सखि स्वरूप सोभा अभिराम ॥

भोग श्रृंगार यशोदा मैया,श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें ।
नीके न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें ॥

तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें ॥

नंद भवन को भूषण माई ।

यशुदा को लाल, वीर हलधर को, राधारमण सदा सुखदाई ॥

इंद्र को इंद्र, देव देवन को, ब्रह्म को ब्रह्म, महा बलदाई ।

काल को काल, ईश ईशन को, वरुण को वरुण, महा बलजाई ॥

शिव को धन, संतन को सरबस, महिमा वेद पुराणन गाई ।

‘नंददास’ को जीवन गिरिधर, गोकुल मंडन कुंवर कन्हाई ॥

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