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जय जय लाल गोवर्धनधारी इंद्रमान भंग कीनो।
वाम भुजा राख्यो गिरिनायक भक्तन कों सुख दीनों॥१॥

सात द्योस मघवा पच हार्यो गोसुर श्रृंगार न भीनो।
कृष्णदास गिरिधर पिय आगे पाय पर्यो बलहीनो ॥२॥

पद्म धर्यो जन ताप निवारण।
चक्र सुदर्शन धर्यो कमल कर भक्तन की रक्षा के कारण॥१॥
शंख धर्यो रिपु उदर विदारन, गदा धरि दुष्टन संहारन।
चारों भुजा चार आयुध धर नारायण भुव भार उतारन॥२॥
दीनानाथ दयाल जगत गुरू आरती हरन भक्त चिंतामन।
परमानंद दास को ठाकुर यह ओसर ओसर छांडो जिन॥३॥

झूलत गोकुल चंद हिंडोरे, झुलावत सब ब्रजनारी।
संग शोभित व्रषभान नंदिनी, पेहेरे कसूंभी सारी॥१॥

पचरंगी डोरी गुहि लीनी, डांडी सरस संवारी।
आसकरण प्रभु मोहन झूलत गिरि गोवरधन धारी ॥२॥

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