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जय जय श्री वल्लभ प्रभु श्री विट्ठलेश साथे। निज जन पर कर कॄपा धरत हाथ माथे।
दोस सबै दूर करत भक्तिभाव हृदय धरत काज सबै सरत सदा गावत गुन गाथे॥१॥

काहे को देह दमत साधन कर मूरख जन विद्यमान आनन्द त्यज चलत क्यों अपाथे।
रसिक चरन सरन सदा रहत है बडभागी जन अपुनो कर गोकुल पति भरत ताहि बाथे॥२॥

श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ गुन गाऊँ।
निरखत सुन्दर स्वरूप बरखत हरिरस अनूप द्विजवर कुल भूप सदा बल बल बल जाऊँ॥१॥

अगम निगन कहत जाहि सुरनर मुनि लहें न ताहि सकल कला गुन निधान पूरन उर लाऊँ।
गोविन्द प्रभु नन्दनन्दन श्री लछमन सुत जगत वंदन सुमिरत त्रयताप हरत चरन रेनु पाऊँ॥२॥

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